नाग पंचमी एक पारंपरिक हिंदू पर्व है जो सर्पों (नागों) और पृथ्वी के खजानों, जल-स्रोतों तथा उर्वरता की रक्षा करने वाले सर्प देवताओं की पूजा को समर्पित है। श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति और उसके सह-निवासियों के प्रति मानवता की प्राचीन श्रद्धा को दर्शाता है।
हिंदू पौराणिक कथाओं में नाग शक्तिशाली दिव्य प्राणी हैं, जिन्हें अक्सर आधा मानव और आधा सर्प के रूप में दर्शाया जाता है। शेषनाग भगवान विष्णु की शय्या हैं, वासुकि का उपयोग समुद्र मंथन में रस्सी के रूप में किया गया था, और तक्षक नागों के प्रसिद्ध राजा हैं। नाग पंचमी पर इनकी पूजा करने से सर्प-दंश से रक्षा होती है, वर्षा सुनिश्चित होती है, और परिवारों को संतान तथा समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है, ऐसी मान्यता है।
यह पर्व कृषि जीवन से गहराई से जुड़ा है। सर्प खेतों में कृंतकों को नियंत्रित करते हैं, और उनकी पूजा उनकी पारिस्थितिक भूमिका को स्वीकार करती है। यह भी माना जाता है कि इस दिन नागों को अर्पित की गई भेंट किसी भी सर्प-संबंधी दोष (नाग दोष) को शांत करती है और पशुधन तथा फसलों की रक्षा करती है।
नाग पंचमी के अनुष्ठानों में महिलाएं केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। वे उपवास रखती हैं, हल्दी और गोबर से घरों की दीवारों या दहलीज पर सर्पों की छवियां बनाती हैं, और दूध, मिठाइयां, फूल तथा प्रार्थनाएं अर्पित करती हैं। कई क्षेत्रों में भाई अपनी विवाहित बहनों से मिलने जाते हैं, जिससे पारिवारिक बंधन और सुदृढ़ होते हैं।