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ऋषि तर्पण (सामवेदिक)

त्यौहार

अन्य नाम: Rishi 5, Rishi Tarpana (Samvedic)

त्वरित जानकारी

2030 में तारीख
शनिवार, 31 अगस्त 2030
तिथि
भाद्रपद शुक्ल तृतीया (पूर्णिमांत)
तिथि प्रारंभ से समाप्ति
02:13 am, 31 अग॰ से 12:32 am, 01 सित॰ तक
चंद्र मास
भाद्रपद · शुक्ल पक्ष
कैलेंडर वर्ष चुनें
Rishi Tarpana (Samvedic)
2030 पर्व तिथि और मुहूर्त

ऋषि तर्पण (सामवेदिक)

शनिवार, 31 अगस्त 2030

चंद्र मास: भाद्रपद

तिथि / मुहूर्त समय
तिथि प्रारंभ:02:13 am, 31 अग॰
तिथि समाप्ति:12:32 am, 01 सित॰

ऋषि तर्पण (सामवेदिक): मुख्य तथ्य

ऋषि तर्पण (सामवेदिक) का दिन चंद्र पंचांग से तय होता है: यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया (तीसरी तिथि) को पड़ता है।

तिथि नियम
भाद्रपद शुक्ल तृतीया (पूर्णिमांत)शुक्ल तृतीयाभाद्रपद मास
तिथि स्वामी और श्रेणी
Gauri · Jaya Tithi
इसी तिथि के अन्य पर्व
वराह जयंतीहरतालिका तीज

आने वाले वर्षों में भाद्रपद शुक्ल तृतीया

वर्षतिथि प्रारंभतिथि समाप्ति
203112:50 pm, बुध, 20 अग॰01:42 pm, गुरु, 21 अग॰
203207:08 am, मंगल, 7 सित॰09:10 am, बुध, 8 सित॰
203307:17 am, शनि, 27 अग॰09:48 am, रवि, 28 अग॰
203411:55 pm, गुरु, 14 सित॰01:44 am, शनि, 16 सित॰
203504:14 am, मंगल, 4 सित॰03:30 am, बुध, 5 सित॰

इस दिन का पंचांग

ऋषि तर्पण (सामवेदिक) · 31 अग॰ 2030

वारशनिवार
तिथिशुक्ल तृतीया02:13 am → 12:32 am
नक्षत्रउत्तर फाल्गुनी07:44 am → 07:01 am
योगशुभ
करणतैतिल
चंद्र मासभाद्रपद
ब्रह्म मुहूर्त04:28 am → 05:13 am
अभिजित मुहूर्त11:55 am → 12:46 pm
निशिता मुहूर्त11:59 pm → 12:44 am
राहु काल09:09 am → 10:45 am

ऋषि तर्पण (सामवेदिक) के बारे में

ऋषि पंचमी भाद्रपद के चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी (पाँचवें दिन) को मनाई जाती है, जो गणेश चतुर्थी के तुरंत पश्चात आती है। यह पर्व सप्तर्षियों—सात महान ऋषियों—की पूजा और रजस्वला दोष, अर्थात मासिक धर्म से जुड़े अनुष्ठानिक दोष, से शुद्धि पाने हेतु समर्पित है।

पूजनीय सात ऋषि हैं कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ, तथा ऋषि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधती। स्त्रियाँ परंपरागत रूप से व्रत रखती हैं और इन ऋषियों का सम्मान करने तथा अपने परिवार की भलाई के लिए प्रार्थना करने हेतु अनुष्ठान करती हैं।

यद्यपि यह मुख्यतः स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है, पुरुष भी अपनी पत्नियों की भलाई के लिए व्रत रख सकते हैं। यह दिन स्वच्छता, आत्म-अनुशासन और उन प्राचीन ऋषियों के प्रति कृतज्ञता पर बल देता है, जिनकी आध्यात्मिक परंपरा ने वैदिक ज्ञान को संरक्षित रखा।

व्रत विधि और उपवास नियम

मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए दोषों की शुद्धि और सात ऋषियों के सम्मान हेतु यह व्रत और अनुष्ठान किए जाते हैं।

चरण-दर-चरण उपवास प्रक्रिया:
  • सूर्योदय से पहले उठें, पवित्र स्नान करें (आदर्शतः किसी नदी में अथवा तिल मिश्रित जल से), और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • पूर्ण व्रत रखें अथवा पूजा के बाद केवल एक बार सात्विक भोजन लें, अनाज, प्याज़, लहसुन और मांसाहार से परहेज़ करते हुए।
  • स्वच्छ वेदी पर सप्तर्षि और अरुंधती का अनुष्ठानिक चित्र बनाएँ अथवा उनकी मूर्तियाँ स्थापित करें।
  • प्रत्येक ऋषि को पान के पत्ते, फूल, कपूर और दीपक अर्पित करें; सप्तर्षियों के नामों का जाप करें।
  • ऋषि पंचमी कथा सुनें, जो यह वर्णन करती है कि इस व्रत का पालन कर्मिक दोषों को कैसे शुद्ध करता है।
  • ब्राह्मण विद्वानों को भोजन कराएँ अथवा दक्षिणा दान करें, और चंद्रमा के दर्शन के बाद अथवा पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करें।

पूजा सामग्री और अनुष्ठान चरण

आवश्यक पूजा सामग्री:
सप्तर्षियों की मूर्तियाँ अथवा नामकुशा घासकाले तिलचावल और कच्चा सूतपान के पत्ते, फूल, कपूरफल और मिठाइयाँएक स्वच्छ ताँबे या पीतल की थालीअगरबत्ती और दीपक
पूजा प्रक्रिया:
  1. वेदी की सफाई करें और सात ऋषियों के नाम लिखें अथवा रखें।
  2. सप्तर्षियों को अर्घ्य (तिल और कुशा मिश्रित जल) अर्पित करें।
  3. प्रत्येक ऋषि को तिलक लगाएँ तथा पान के पत्ते, फूल और अगरबत्ती अर्पित करें।
  4. दीपक और कपूर जलाएँ तथा ऋषियों की महिमा में प्रार्थनाएँ करें।
  5. विद्वानों अथवा बड़ों को प्रसाद और दक्षिणा अर्पित करें।
  6. आरती और क्षमा तथा शुद्धि की प्रार्थना के साथ समापन करें।

व्रत कथा: ऋषि पंचमी का शुद्धिकारी व्रत

पूर्वजन्म में, चंद्रावती नामक एक भक्त ब्राह्मण स्त्री ने अनजाने में अपने मासिक धर्म के दौरान अनुष्ठानिक नियमों का उल्लंघन कर दिया। इसके कर्म फलस्वरूप, वह एक चीतल के रूप में पुनर्जन्म लेकर, बोलने अथवा पवित्र कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हो गई।

एक दिन, उसका सामना ऋषियों के एक समूह से हुआ, जो ऋषि पंचमी का पालन कर रहे थे। पूर्व-भक्ति से आकर्षित होकर, वह चुपचाप बैठ गई और कथा सुनने लगी। व्रत की पवित्र तरंगों और सप्तर्षियों के आशीर्वाद ने धीरे-धीरे उसके कर्मों को विलीन कर दिया।

उसी रात, वह अपने पशु रूप से मुक्त होकर एक धर्मपरायण मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म पाई। तभी से, ऋषि पंचमी को शुद्धि और क्षमा के एक शक्तिशाली साधन के रूप में मनाया जाता है, विशेषकर उन स्त्रियों के लिए जो रजस्वला दोष के प्रभावों को दूर करना चाहती हैं।

ऋषि तर्पण (सामवेदिक): अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: ऋषि तर्पण (सामवेदिक) किस तिथि को मनाया जाता है?

भाद्रपद शुक्ल तृतीया; स्वामी Gauri, Jaya Tithi।

प्रश्न: 2030 में ऋषि तर्पण (सामवेदिक) की तिथि कब से कब तक है?

शुक्ल तृतीया: 02:13 am, शनि, 31 अग॰ 2030 से 12:32 am, रवि, 1 सित॰ 2030 तक (भारतीय मानक समय)।

प्रश्न: 2031 में ऋषि तर्पण (सामवेदिक) की तिथि कब है?

भाद्रपद शुक्ल तृतीया: 12:50 pm, बुध, 20 अग॰ 2031 से 01:42 pm, गुरु, 21 अग॰ 2031 तक (भारतीय मानक समय)।

प्रश्न: ऋषि तर्पण (सामवेदिक) की तिथि पर और कौन से पर्व पड़ते हैं?

वराह जयंती और हरतालिका तीज (भाद्रपद शुक्ल तृतीया)।

प्रश्न: क्या पुरुष ऋषि पंचमी का व्रत रख सकते हैं?

हाँ, पुरुष भी अपनी पत्नियों और परिवार की भलाई के लिए व्रत रख सकते हैं और सप्तर्षियों की पूजा कर सकते हैं।

प्रश्न: ऋषि पंचमी पर किन ऋषियों की पूजा की जाती है?

सप्तर्षि—कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ—तथा अरुंधती की पूजा की जाती है।

प्रश्न: क्या ऋषि पंचमी पर व्रत रखना अनिवार्य है?

अधिकांश भक्त कम से कम आंशिक व्रत अथवा कठोर सात्विक आहार का पालन करते हैं, हालाँकि सटीक परंपराएँ पारिवारिक रीति-रिवाज़ के अनुसार भिन्न होती हैं।

टिप्पणी: समय तारीख सहित दिए गए हैं; पंचांग का दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक होता है।