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Shankaracharya Jayanti

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Shankaracharya Jayanti
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Shankaracharya Jayanti

Shankaracharya Jayanti: मुख्य तथ्य

Shankaracharya Jayanti का दिन चंद्र पंचांग से तय होता है: यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी (पाँचवीं तिथि) को पड़ता है।

तिथि नियम
वैशाख शुक्ल पंचमी (पूर्णिमांत)शुक्ल पंचमीवैशाख मास
तिथि स्वामी और श्रेणी
Naga · Purna Tithi

Shankaracharya Jayanti के बारे में

शंकराचार्य जयंती आदि शंकराचार्य के जन्म का उत्सव है, जो 8वीं शताब्दी के दार्शनिक-संत थे जिन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को समेकित और व्यवस्थित किया। केरल के कालडी में जन्मे, वे भारतीय इतिहास के महानतम आध्यात्मिक गुरुओं में से एक माने जाते हैं।

आदि शंकराचार्य ने पैदल पूरे भारत की यात्रा की, उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों पर गहन भाष्य रचे। उन्होंने श्रृंगेरी, पुरी, द्वारका और जोशीमठ में चार प्रमुख मठों की स्थापना की और दशनामी संन्यासी संप्रदाय का आयोजन किया।

उनका दर्शन सिखाता है कि व्यष्टि आत्मा (आत्मन्) और परम सत्य (ब्रह्म) एक ही हैं, तथा मुक्ति आत्मज्ञान और माया के मोह से विरक्ति के माध्यम से प्राप्त होती है। शंकराचार्य जयंती शास्त्र अध्ययन, शास्त्रार्थ, सत्संग और गुरु परंपरा की पूजा के साथ मनाई जाती है।

व्रत विधि और उपवास नियम

भक्त इस दिन को अध्ययन, ध्यान और गुरु-शिष्य परंपरा की पूजा के माध्यम से मनाते हैं।

चरण-दर-चरण उपवास प्रक्रिया:
  • ब्रह्म मुहूर्त में जागें, स्नान करें और ध्यान के लिए बैठें, 'अहं ब्रह्मास्मि' तथा 'तत्त्वमसि' महावाक्यों का चिंतन करते हुए।
  • आदि शंकराचार्य की कृतियाँ जैसे विवेकचूड़ामणि, आत्मबोध अथवा भज गोविंदम् पढ़ें अथवा सुनें।
  • भगवान शिव अथवा दक्षिणामूर्ति (मौन गुरु के रूप में शिव) और आदि शंकराचार्य की फूल, बिल्वपत्र और दीपक से पूजा करें।
  • हल्का व्रत रखें अथवा आत्मचिंतन पर मन केंद्रित करते हुए दिन में एक बार सात्विक भोजन लें।
  • सत्संग, वेदांत प्रवचन में सम्मिलित हों अथवा गुरु स्तोत्र का जाप करें।
  • विद्वानों और भक्तों की सेवा करें, तथा दिनभर विनम्रता, सत्य और अनासक्ति का अभ्यास करें।

पूजा सामग्री और अनुष्ठान चरण

आवश्यक पूजा सामग्री:
आदि शंकराचार्य और भगवान शिव/दक्षिणामूर्ति की प्रतिमाबिल्वपत्रसफेद फूलचंदन का लेप और विभूतिअगरबत्ती और घी का दीपकफल और सात्विक प्रसादवेदांत की पुस्तकें
पूजा प्रक्रिया:
  1. प्रतिमाओं की स्थापना करें और वेदी को स्वच्छ करें।
  2. जल, दूध अथवा पंचामृत से अभिषेक करें।
  3. चंदन का लेप और विभूति लगाएँ; बिल्वपत्र और फूल अर्पित करें।
  4. अगरबत्ती और दीपक जलाएँ; दक्षिणामूर्ति स्तोत्र अथवा गुरु स्तोत्र का जाप करें।
  5. शंकराचार्य की कृतियों से पाठ करें।
  6. आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

व्रत कथा: मगरमच्छ और संन्यास

आदि शंकराचार्य का जन्म कालडी में धर्मपरायण ब्राह्मण माता-पिता के घर हुआ था। जब वे बालक थे, वे पूर्णा नदी में स्नान करने गए। अचानक एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया और छोड़ने का नाम न लिया। उनकी माता विलाप करती हुई किनारे पर दौड़ी आईं।

बालक ने शांतिपूर्वक अपनी माता से कहा कि यदि वे उन्हें संन्यास लेने की अनुमति दें, तो मगरमच्छ उन्हें छोड़ देगा। अपने पुत्र को बचाने के लिए कोई अन्य उपाय न होने पर, माता ने सहमति दे दी। जैसे ही शंकर ने संन्यास के पवित्र व्रत का उच्चारण किया, मगरमच्छ ने उन्हें छोड़ दिया। इस प्रकार वे घर छोड़कर परिव्राजक संन्यासी बन गए, और अंततः अद्वैत वेदांत के ज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिए संपूर्ण भारत की यात्रा की।

Shankaracharya Jayanti: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: Shankaracharya Jayanti किस तिथि को मनाया जाता है?

वैशाख शुक्ल पंचमी; स्वामी Naga, Purna Tithi।

प्रश्न: अद्वैत वेदांत क्या है?

अद्वैत वेदांत वह अद्वैतवादी दर्शन है जिसके अनुसार व्यष्टि आत्मा (आत्मन्) और परम सत्य (ब्रह्म) एक ही हैं।

प्रश्न: आदि शंकराचार्य का जन्म कहाँ हुआ था?

उनका जन्म भारत के केरल राज्य के कालडी में हुआ था।

प्रश्न: आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ कौन-से हैं?

दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पुरी, पश्चिम में द्वारका और उत्तर में ज्योतिर्मठ (जोशीमठ)।

टिप्पणी: समय तारीख सहित दिए गए हैं; पंचांग का दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक होता है।