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Skandakanta

त्यौहार

अन्य नाम: Skanda 6, Skandakanta

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Skandakanta
2026 पर्व तिथि और मुहूर्त

Skandakanta

Skandakanta: मुख्य तथ्य

Skandakanta का दिन चंद्र पंचांग से तय होता है: यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी (छठी तिथि) को पड़ता है।

तिथि नियम
आषाढ़ शुक्ल षष्ठी (पूर्णिमांत)शुक्ल षष्ठीआषाढ़ मास
तिथि स्वामी और श्रेणी
Kartikeya · Nanda Tithi

Skandakanta के बारे में

स्कंद षष्ठी, जिसे स्कंद 6 या स्कंदकांता भी कहा जाता है, भगवान शिव तथा माता पार्वती के पुत्र भगवान स्कंद को समर्पित छह दिवसीय पर्व है। उन्हें व्यापक रूप से कार्तिकेय, मुरुगन, सुब्रह्मण्य, तथा कुमार के नाम से पूजा जाता है, जो देवताओं की सेनाओं के सेनापति हैं।

यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर षष्ठी (छठे दिन) को संपन्न होता है, जो प्रायः अक्टूबर या नवंबर में आता है। यह भगवान स्कंद की राक्षस सुरपद्म पर विजय तथा देवताओं और भक्तों की उनके द्वारा की गई रक्षा का उत्सव है।

श्रद्धालु व्रत रखते हैं, विशेष पूजा करते हैं, मुरुगन या सुब्रह्मण्य मंदिरों में जाते हैं, तथा कीर्तन गाते हैं। समापन दिवस, सूरसंहारम, सुरपद्म के वध का प्रतीक है, तथा अगले दिन दक्षिण भारत में तिरुकल्याणम (दिव्य विवाह) मनाया जाता है।

व्रत विधि और उपवास नियम

भगवान स्कंद को समर्पित छह दिवसीय व्रत तथा पूजा, जो सुरपद्म पर उनकी विजय के उत्सव के साथ पूर्ण होती है।

चरण-दर-चरण उपवास प्रक्रिया:
  • कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से व्रत आरंभ करें और छह दिनों तक इसका पालन करें, दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करें या फल व दूध के साथ उपवास करें।
  • प्रातः शीघ्र उठें, स्नान करें, तथा यदि संभव हो तो प्रतिदिन सुब्रह्मण्य या मुरुगन मंदिर में जाएं।
  • स्कंद षष्ठी कवचम्, सुब्रह्मण्य भुजंगम्, अथवा 'ॐ सरवणभवाय नमः' का जाप करें।
  • छहों दिनों के दौरान तामसिक भोजन, क्रोध, तथा नकारात्मक वाणी से बचें।
  • षष्ठी के दिन विशेष अभिषेक करें तथा लाल फूल, कुमकुम, चंदन, और शहद अर्पित करें।
  • व्रत का समापन दान तथा भक्तों को भोजन कराकर करें।

पूजा सामग्री और अनुष्ठान चरण

आवश्यक पूजा सामग्री:
भगवान स्कंद/मुरुगन की मूर्ति या प्रतिमालाल फूल तथा कुमकुमचंदन का लेपशहद तथा दूधअगरबत्ती तथा घी का दीपकफल, विशेषकर केलाखस तथा सुगंधित तेल
पूजा प्रक्रिया:
  1. देवता को स्थापित करें और वेदी को स्वच्छ करें।
  2. दूध, शहद, तथा जल से अभिषेक करें।
  3. चंदन का लेप तथा कुमकुम लगाएं; लाल फूल अर्पित करें।
  4. अगरबत्ती तथा दीपक जलाएं; स्कंद मंत्रों का जाप करें।
  5. फल तथा मिठाइयों का भोग अर्पित करें।
  6. आरती करें और मंदिर की परिक्रमा करें।

व्रत कथा: स्कंद और राक्षस सुरपद्म

राक्षस सुरपद्म ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त कर देवताओं को बंदी बना लिया था। उसे पराजित करने में असमर्थ, देवता भगवान शिव के पास पहुंचे, जिन्होंने अपने तीसरे नेत्र से एक तेजस्वी षडानन पुत्र—भगवान स्कंद—को प्रकट किया।

दिव्य भाला (वेल) धारण किए स्कंद ने देवताओं की सेनाओं का युद्ध में नेतृत्व किया। छठे दिन, उन्होंने सुरपद्म का वध कर देवताओं को मुक्त किया और सृष्टि की व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया। कृतज्ञ भक्त इस विजय को स्कंद षष्ठी के रूप में मनाते हैं, तथा भगवान की दिव्य सेनाओं के सेनापति के रूप में स्तुति करते हैं।

Skandakanta: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: Skandakanta किस तिथि को मनाया जाता है?

आषाढ़ शुक्ल षष्ठी; स्वामी Kartikeya, Nanda Tithi।

प्रश्न: क्या स्कंद षष्ठी केवल दक्षिण भारत में मनाई जाती है?

यह विशेष रूप से तमिलनाडु में भव्यता से मनाई जाती है, परंतु भारत तथा विश्वभर के श्रद्धालु कार्तिकेय मंदिरों में इसका पालन करते हैं।

प्रश्न: सूरसंहारम क्या है?

यह स्कंद षष्ठी का छठा दिन है, जो भगवान स्कंद द्वारा राक्षस सुरपद्म की पराजय का स्मरण कराता है।

प्रश्न: मुरुगन पूजा में भाले (वेल) का क्या महत्व है?

वेल दिव्य ज्ञान तथा अज्ञान व बुराई का नाश करने की शक्ति का प्रतीक है।

टिप्पणी: समय तारीख सहित दिए गए हैं; पंचांग का दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक होता है।