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अशून्यशयन व्रत

त्यौहार

त्वरित जानकारी

2037 में तारीख
मंगलवार, 28 जुलाई 2037
तिथि
श्रावण कृष्ण द्वितीया (पूर्णिमांत)
तिथि प्रारंभ से समाप्ति
11:21 am, 28 जुल॰ से 01:19 pm, 29 जुल॰ तक
चंद्र मास
श्रावण · कृष्ण पक्ष
कैलेंडर वर्ष चुनें
Ashunyashayana Vrata
2037 पर्व तिथि और मुहूर्त

अशून्यशयन व्रत

मंगलवार, 28 जुलाई 2037

चंद्र मास: श्रावण

तिथि / मुहूर्त समय
तिथि प्रारंभ:11:21 am, 28 जुल॰
तिथि समाप्ति:01:19 pm, 29 जुल॰

अशून्यशयन व्रत: मुख्य तथ्य

अशून्यशयन व्रत का दिन चंद्र पंचांग से तय होता है: यह श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया (दूसरी तिथि) को पड़ता है, जिसे अमांत पंचांग आषाढ़ कृष्ण द्वितीया कहता है।

तिथि नियम
श्रावण कृष्ण द्वितीया (पूर्णिमांत)कृष्ण द्वितीयाश्रावण मास
तिथि स्वामी और श्रेणी
Brahma · Bhadra Tithi

आने वाले वर्षों में श्रावण कृष्ण द्वितीया

वर्षतिथि प्रारंभतिथि समाप्ति
204003:43 am, बुध, 25 जुल॰12:02 am, गुरु, 26 जुल॰

इस दिन का पंचांग

अशून्यशयन व्रत · 28 जुल॰ 2037

वारमंगलवार
तिथिकृष्ण द्वितीया11:21 am → 01:19 pm
नक्षत्रश्रवण09:31 am → 11:44 am
योगआयुष्मान
करणतैतिल
चंद्र मासआषाढ
ब्रह्म मुहूर्त04:17 am → 04:58 am
अभिजित मुहूर्त12:00 pm → 12:54 pm
निशिता मुहूर्त12:06 am → 12:48 am
राहु काल03:51 pm → 05:32 pm

अशून्यशयन व्रत के बारे में

अशून्यशयन व्रत, जिसे अशून्य शयनी व्रत भी कहा जाता है, चातुर्मास काल के दौरान भगवान विष्णु को समर्पित एक पवित्र अनुष्ठान है, वह चार पवित्र महीने जब भगवान शेषनाग पर योगनिद्रा में विराजमान माने जाते हैं। 'अशून्यशयन' शब्द का अर्थ है 'भूमि पर सोना' अथवा 'शय्या पर न सोना', जो भगवान के विश्राम के दौरान तप और भक्ति के कार्य के रूप में भूमि पर सोने के भक्त के संकल्प को दर्शाता है। यह आध्यात्मिक अनुशासन तथा समर्पण का गहन प्रकटीकरण है।

यह व्रत सामान्यतः देवशयनी एकादशी के आसपास आरंभ होता है, जब भगवान विष्णु को विधिवत शयन कराया जाता है, और देवप्रबोधिनी एकादशी तक जारी रहता है, जब वे जागृत होते हैं। इस अवधि में, भक्त सुख-सुविधाओं को न्यूनतम करते हैं, अपनी जीवनशैली सरल बनाते हैं, तथा अपनी आध्यात्मिक साधना को तीव्र करते हैं। भूमि पर सोना विनम्र रहने, शारीरिक सुख-सुविधाओं से विरक्त रहने, तथा ईश्वर की ब्रह्मांडीय लय के साथ तालमेल बिठाने का प्रतीकात्मक माध्यम माना जाता है।

यह अनुष्ठान वैष्णवों तथा विष्णु की कृपा चाहने वालों के लिए विशेष महत्व रखता है। भूमि पर सोने के साथ-साथ, भक्त कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करते हैं, विवाह जैसे शुभ समारोहों से बचते हैं, तथा शास्त्र अध्ययन, जप और दान में वृद्धि करते हैं। अशून्यशयन व्रत वैराग्य, आत्म-अनुशासन तथा आंतरिक संतोष की साधना सिखाता है।

व्रत विधि और उपवास नियम

इस व्रत में पूरे चातुर्मास काल में भूमि पर शयन करना, आहार-संयम रखना, तथा विष्णु पूजा को तीव्र करना शामिल है।

चरण-दर-चरण उपवास प्रक्रिया:
  • देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु के समक्ष पूरे चातुर्मास भूमि पर सोने का संकल्प लेकर व्रत आरंभ करें।
  • शय्या, खटिया अथवा ऊँची शयन-व्यवस्था से बचते हुए, भूमि पर साधारण चटाई अथवा कपड़े पर सोएँ।
  • सात्विक आहार लें; अनेक भक्त प्याज और लहसुन तथा तीखे मसालों से परहेज करते हैं, जबकि कठोर पालन करने वाले कुछ सब्जियों से भी परहेज कर सकते हैं।
  • प्रतिदिन विष्णु पूजा करें, विष्णु सहस्रनाम का जप करें, तथा भगवद्गीता अथवा श्रीमद्भागवत जैसे शास्त्रों का पाठ करें।
  • चातुर्मास काल के दौरान विवाह, गृहप्रवेश अथवा अन्य शुभ समारोहों को आरंभ करने से परहेज करें।
  • देवप्रबोधिनी एकादशी को विशेष पूजा, दान तथा भूमि-शयन के व्रत को पूर्ण करते हुए इस व्रत का समापन करें।

पूजा सामग्री और अनुष्ठान चरण

आवश्यक पूजा सामग्री:
शेषनाग पर शयन करते भगवान विष्णु की प्रतिमातुलसी दलपीले पुष्पपंचामृतचंदन का लेपधूप और दीपकपवित्र गंगाजलफल और मिष्ठान्न
पूजा प्रक्रिया:
  1. शेषनाग पर शयन करते भगवान विष्णु की प्रतिमा के साथ वेदी स्थापित करें।
  2. पंचामृत, तुलसी दल तथा पीले पुष्पों का विधिवत अर्पण करें।
  3. भगवान के शयन रूप का आवाहन करने के लिए विष्णु सहस्रनाम अथवा शयन मंत्र का जप करें।
  4. दीपक और धूप जलाएँ, आरती करें, तथा व्रत काल में सादगी बनाए रखने का संकल्प लें।

अशून्यशयन व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: अशून्यशयन व्रत किस तिथि को मनाया जाता है?

श्रावण कृष्ण द्वितीया (अमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण द्वितीया); स्वामी Brahma, Bhadra Tithi।

प्रश्न: 2037 में अशून्यशयन व्रत की तिथि कब से कब तक है?

कृष्ण द्वितीया: 11:21 am, मंगल, 28 जुल॰ 2037 से 01:19 pm, बुध, 29 जुल॰ 2037 तक (भारतीय मानक समय)।

प्रश्न: अशून्यशयन व्रत कब आरंभ और समाप्त होता है?

यह सामान्यतः देवशयनी एकादशी से आरंभ होकर देवप्रबोधिनी एकादशी को समाप्त होता है, जो चार महीने के चातुर्मास काल को कवर करता है।

प्रश्न: क्या वृद्ध अथवा अस्वस्थ भक्त भूमि-शयन के नियम का पालन कर सकते हैं?

हाँ, व्रत को अपने स्वास्थ्य के अनुसार अनुकूलित किया जाना चाहिए। इसका सार सादगी और विनम्रता है; वृद्ध अथवा अस्वस्थ भक्त पतली गद्दी का प्रयोग कर सकते हैं अथवा नीची चटाई पर सो सकते हैं।

प्रश्न: क्या यह व्रत केवल पुरुषों के लिए है?

नहीं, पुरुष तथा स्त्री दोनों अशून्यशयन व्रत रख सकते हैं। गर्भवती स्त्रियों तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं वाले लोगों को इस अनुष्ठान को तदनुसार अनुकूलित करना चाहिए।

टिप्पणी: समय तारीख सहित दिए गए हैं; पंचांग का दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक होता है।